अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दतब जानकीजी सासके पाँव लगीं और बोलीं—हे माता! सुनिये, मैं बड़ी ही अभागिनी हूँ। आपकी सेवा करनेके समय दैवने मुझे वनवास दे दिया। मेरा मनोरथ सफल न किया॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 400 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी।।
सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा।।
स्रोत अभिलेख 2.69 · पुस्तक पृ. 400, 401
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी।।
English explanation
Then Sita bowed at her mother-in-law’s feet and said, ‘Mother, please listen: I am most unfortunate.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तब | तब | then |
| जानकी | जनक की पुत्री सीता | Sita, daughter of Janaka |
| सासु | सास कौसल्या के | of her mother-in-law Kaushalya |
| पग | चरणों में | at the feet |
| लागी | प्रणाम करने लगीं | bowed in reverence |
| सुनिअ | सुनिए | please listen |
| माय | हे माँ | O mother |
| मैं | मैं | I |
| परम | अत्यंत | most |
| अभागी | दुर्भाग्यवती | unfortunate |
2 सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा।।
English explanation
When the time came to serve you, fate assigned me life in the forest; it did not fulfill my wish to serve you.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सेवा | आपकी सेवा का | for serving you |
| समय | समय आने पर | when the time came |
| दैअँ | दैव ने | fate |
| बनु | वनवास | life in the forest |
| दीन्हा | दे दिया | assigned |
| मोर | मेरा | my |
| मनोरथु | सेवा करने की अभिलाषा | wish to serve |
| सफल | पूर्ण | fulfilled |
| न | नहीं | not |
| कीन्हा | किया | made |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.69
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 400
- सहायक विषय
- श्रीराम-कौसल्या-सीता-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 400, 401
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।