अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दयदि जगत्में भरतका जन्म न होता, तो पृथ्वीपर सम्पूर्ण धर्मोंकी धुरीको कौन धारण करता? हे रघुनाथजी! कविकुलके लिये अगम (उनकी कल्पनासे अतीत) भरतजीके गुणोंकी कथा आपके सिवा और कौन जान सकता है?॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 537 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को।।
कबि कुल अगम भरत गुन गाथा। को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा।।
स्रोत अभिलेख 2.233 · पुस्तक पृ. 537, 538
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को।।
English explanation
AI draft: Had Bharata not been born in this world, who would have borne the burden of all righteousness on earth?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जौं | यदि | if |
| न | नहीं | not |
| होत | होता | had occurred |
| जग | संसार में | in the world |
| जनम | जन्म | birth |
| भरत | भरत, राम के भाई | Bharata, Rama’s brother |
| को | का | of |
| सकल | समस्त | all |
| धरम | धर्म का | of righteousness |
| धुर | भार | burden |
| धरनि | पृथ्वी पर | on earth |
| धरत | धारण करता | would bear |
| को | कौन | who |
2 कबि कुल अगम भरत गुन गाथा। को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा।।
English explanation
The account of Bharata’s virtues lies beyond the reach of poets. Who but you, O Rama, knows it?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कबि | कवियों का | of poets |
| कुल | समुदाय | community |
| अगम | पहुँच से परे | beyond comprehension |
| भरत | भरत के | Bharata’s |
| गुन | गुणों की | of virtues |
| गाथा | गाथा | account |
| को | कौन | who |
| जानइ | जानता है | knows |
| तुम्ह | आपके | you |
| बिनु | बिना | without; except for |
| रघुनाथा | हे रघुनाथ, राम | O Rama, lord of Raghu’s line |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.233
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 537
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 537, 538
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।