अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची।।
मूल पाठ
जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची।।
सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई।।
स्रोत अभिलेख 2.268 · पुस्तक पृ. 567, 567
भावार्थ
मूल पाठ के बादजो सेवक स्वामीको संकोचमें डालकर अपना भला चाहता है, उसकी बुद्धि नीच है। सेवकका हित तो इसीमें है कि वह समस्त सुखों और लोभोंको छोड़कर स्वामीकी सेवा ही करे॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 567 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची।।
English explanation
A servant who seeks his own advantage by putting his master in a difficult position has a petty understanding.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जो | जो | whoever |
| सेवकु | सेवक | servant |
| साहिबहि | स्वामी को | the master |
| सँकोची | संकोच में डालकर | putting in a difficult position |
| निज | अपना | his own |
| हित | हित | advantage |
| चहइ | चाहता है | seeks |
| तासु | उसकी | his |
| मति | बुद्धि | understanding |
| पोची | तुच्छ; ओछी | petty; shallow |
2 सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई।।
English explanation
A servant’s welfare lies in serving his master while relinquishing all craving for pleasure.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सेवक | सेवक का | the servant’s |
| हित | हित | welfare |
| साहिब | स्वामी की | of the master |
| सेवकाई | सेवा | service |
| करै | करे | should perform |
| सकल | सभी | all |
| सुख | सुखों का | for pleasures |
| लोभ | लोभ | craving |
| बिहाई | छोड़कर | having relinquished |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.268
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 567
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरतादिका संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 567, 567
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