अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारे।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दजो मेरा वचन सुनते ही आपको बाण-सा लगा तो आप सोच-समझकर बात क्यों नहीं कहते? उत्तर दीजिये—हाँ कीजिये, नहीं तो नाहीं कर दीजिये। आप रघुवंशमें सत्य प्रतिज्ञावाले [प्रसिद्ध] हैं!॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 368 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारे।।
देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं।।
स्रोत अभिलेख 2.3 · पुस्तक पृ. 368, 369
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारे।।
English explanation
If hearing my words struck you like an arrow, why do you not speak with care?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जो | जो; यदि | if; what |
| सुनि | सुनकर | on hearing |
| सरु | बाण | an arrow |
| अस | ऐसा; इस प्रकार | thus; like this |
| लाग | लगा | struck |
| तुम्हारें | आपको | you |
| काहे | क्यों | why |
| न | नहीं | not |
| बोलहु | आप बोलते | do you speak |
| बचनु | वचन; बात | words |
| सँभारे | सँभालकर; सोच-समझकर | carefully; thoughtfully |
2 देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं।।
English explanation
Give me an answer: will you comply with my request or not? You are pledged to truth in the house of Raghu.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देहु | दीजिए | give |
| उतरु | उत्तर | an answer |
| अनु | मेरी बात के अनुकूल | in accordance with my request |
| करहु | आप करेंगे | will you do |
| कि | या | or |
| नाहीं | नहीं | not |
| सत्यसंध | सत्यप्रतिज्ञ; वचन के पक्के | pledged to truth; true to your word |
| तुम्ह | आप | you |
| रघुकुल | रघु का राजवंश | the royal house of Raghu |
| माहीं | में | in |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.3
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 368
- सहायक विषय
- दशरथ-कैकेयी-संवाद और दशरथ-शोक, सुमन्त्रका महलमें जाना और वहाँसे लौटकर श्रीरामजीको महलमें भेजना
- मुद्रित पृष्ठ
- 368, 369
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।