अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा।।
मूल पाठ
जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा।।
तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें।।
स्रोत अभिलेख 2.208 · पुस्तक पृ. 516, 516
भावार्थ
मूल पाठ के बादप्रयागराजमें जब वे स्नान कर रहे थे, उस समय मैंने उनका यह मर्म जाना। वे तुम्हारे प्रेममें मग्र हो रहे थे। तुमपर श्रीरामचन्द्रजीका ऐसा ही (अगाध) स्नेह है जैसा मूर्ख (विषयासक्त) मनुष्यका संसारमें सुखमय जीवनपर होता है॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 516 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा।।
English explanation
While bathing at Prayaga, I understood this inner truth: they become absorbed in their love for you.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जाना | मैंने जाना | I understood |
| मरमु | भीतरी रहस्य | inner truth |
| नहात | स्नान करते समय | while bathing |
| प्रयागा | प्रयाग में | at Prayaga, the sacred confluence |
| मगन | मग्न | absorbed |
| होहिं | हो जाते हैं | become |
| तुम्हरें | तुम्हारे प्रति | for you |
| अनुरागा | प्रेम में | in love |
2 तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें।।
English explanation
Rama’s affection for you is like an unwise person’s attachment to pleasure, life, and worldly fame.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुम्ह | तुम | you |
| पर | के प्रति | toward |
| अस | ऐसा | such |
| सनेहु | स्नेह | affection |
| रघुबर | रघुकुल-श्रेष्ठ राम | Rama, foremost of Raghu’s line |
| कें | को है | has |
| सुख | सुख से | to pleasure |
| जीवन | जीवन से | to life |
| जग | संसार में | in the world |
| जस | यश से | to fame |
| जड़ | अज्ञानी | unwise |
| नर | मनुष्य | person |
| कें | को होता है | has |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.208
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 516
- सहायक विषय
- भरतजीका प्रयाग जाना और भरत-भरद्वाज-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 516, 516
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