अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती।।
मूल पाठ
जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती।।
समउ समाजु लाज गुरुजन की। उदासीन हित अनहित मन की।।
स्रोत अभिलेख 2.305 · पुस्तक पृ. 599, 600
भावार्थ
मूल पाठ के बादहे तात! तुम सूर्यकुलकी रीतिको, सत्यप्रतिज्ञ पिताजीकी कीॢत और प्रीतिको, समय, समाज और गुरुजनोंकी लज्जा (मर्यादा) को तथा उदासीन, मित्र और शत्रु सबके मनकी बातको जानते हो॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 599 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती।।
English explanation
Dear brother, you know the tradition of the solar dynasty, Father's steadfastness in keeping his word, and his love of a good name.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जानहु | आप जानते हैं | you know |
| तात | प्रिय भाई | dear brother |
| तरनि | सूर्य | the sun |
| कुल | वंश की | of the dynasty |
| रीती | परंपरा | tradition |
| सत्यसंध | सत्यप्रतिज्ञ | steadfast in keeping his word |
| पितु | पिता | Father |
| कीरति | यश के प्रति | for a good name |
| प्रीती | प्रेम | love |
2 समउ समाजु लाज गुरुजन की। उदासीन हित अनहित मन की।।
English explanation
You know the circumstances and the assembly, the honor due to elders, and the thoughts of those who are neutral, friendly, or hostile.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| समउ | समय और परिस्थिति | the time and circumstances |
| समाजु | सभा | the assembly |
| लाज | मान-मर्यादा | honor |
| गुरुजन | गुरुओं और बड़ों | teachers and elders |
| की | की | of |
| उदासीन | तटस्थ लोगों | neutral people |
| हित | हितैषियों | well-wishers |
| अनहित | अहित चाहने वालों | those wishing harm |
| मन | मन | minds |
| की | की बात | what is in |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.305
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 599
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 599, 600
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।