अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई।।
मूल पाठ
जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई।।
लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुन पावन पेम प्रान की।।
स्रोत अभिलेख 2.286 · पुस्तक पृ. 582, 583
भावार्थ
मूल पाठ के बादजनकजी श्रीरामजीके गुरु वसिष्ठजीकी आज्ञा पाकर डेरेको चले और आकर उन्होंने सीताजीको देखा। जनकजीने अपने पवित्र प्रेम और प्राणोंकी पाहुनी जानकीजीको हृदयसे लगा लिया॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 582 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई।।
English explanation
With permission from Rama and the teacher, Janaka went to his lodging; seeing him, Sita came there.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जनक | राजा जनक | King Janaka |
| राम | राम की | Rama’s |
| गुर | गुरु की | the teacher’s |
| आयसु | अनुमति | permission |
| पाई | पाकर | having received |
| चले | चले | departed |
| थलहि | अपने ठहरने के स्थान को | to his lodging |
| सिय | सीता | Sita |
| देखी | देखकर | seeing him |
| आई | आईं | came |
2 लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुन पावन पेम प्रान की।।
English explanation
Janaka clasped Sita to his heart; she was the sacred guest of his love and very life.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लीन्हि | ले लिया | took |
| लाइ | लगाकर | drawing close |
| उर | हृदय से | to his heart |
| जनक | राजा जनक ने | King Janaka |
| जानकी | सीता को | Sita |
| पाहुन | अतिथि | guest |
| पावन | पवित्र | sacred |
| पेम | प्रेम | love |
| प्रान | प्राणों | his very life |
| की | की | of |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.286
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 582
- सहायक विषय
- कौसल्या-सुनयना-संवाद, श्रीसीताजीका शील
- मुद्रित पृष्ठ
- 582, 583
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।