अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई।।
मूल पाठ
चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई।।
भलेहीं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए। प्रमुदित निज निज काज सिधाए।।
स्रोत अभिलेख 2.213 · पुस्तक पृ. 520, 521
भावार्थ
मूल पाठ के बाद[और कहा कि] भरतकी पहुनई करनी चाहिये। जाकर कन्द, मूल और फल लाओ। उन्होंने 'हे नाथ! बहुत अच्छा कहकर सिर नवाया और तब वे बड़े आनन्दित होकर अपने-अपने कामको चल दिये॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 520 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई।।
English explanation
Bharata must be offered hospitality; go and bring tubers, roots, and fruit.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चाहिए | चाहिए | ought to be |
| कीन्ह | किया जाना | done |
| भरत | भरत का | for Bharata |
| पहुनाई | अतिथि-सत्कार | hospitality |
| कंद | कंद | edible tubers |
| मूल | जड़ें | edible roots |
| फल | फल | fruit |
| आनहु | लाओ | bring |
| जाई | जाकर | having gone |
2 भलेहीं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए। प्रमुदित निज निज काज सिधाए।।
English explanation
Saying, ‘Certainly, master,’ they bowed their heads and joyfully went about their respective tasks.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भलेहीं | अवश्य; अच्छा | certainly; very well |
| नाथ | हे स्वामी | O master |
| कहि | कहकर | having said |
| तिन्ह | उन्होंने | they |
| सिर | सिर | heads |
| नाए | झुकाए | bowed |
| प्रमुदित | अत्यंत प्रसन्न होकर | delighted |
| निज | अपने | their own |
| निज | अपने | respective |
| काज | काम के लिए | to their tasks |
| सिधाए | चले गए | departed |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.213
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 520
- सहायक विषय
- भरद्वाजद्वारा भरतका सत्कार
- मुद्रित पृष्ठ
- 520, 521
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।