अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके।।
मूल पाठ
चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके।।
हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई।।
स्रोत अभिलेख 2.158 · पुस्तक पृ. 474, 475
भावार्थ
मूल पाठ के बादहवाके समान वेगवाले घोड़ोंको हाँकते हुए वे विकट नदी, पहाड़ तथा जंगलोंको लाँघते हुए चले। उनके हृदयमें बड़ा सोच था, कुछ सुहाता न था। मनमें ऐसा सोचते थे कि उड़कर पहुँच जाऊँ॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 474 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके।।
English explanation
Bharata traveled at the speed of the wind, urging the horses onward and crossing rivers, mountains, and difficult forests.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चले | चल पड़े | set off |
| समीर | पवन | the wind |
| बेग | वेग से | at the speed of |
| हय | घोड़ों को | the horses |
| हाँके | हाँकते हुए | urging onward |
| नाघत | पार करते हुए | crossing |
| सरित | नदियाँ | rivers |
| सैल | पर्वत | mountains |
| बन | वन | forests |
| बाँके | दुर्गम | difficult to traverse |
2 हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई।।
English explanation
Great anxiety filled his heart, and nothing pleased him. Bharata thought to himself, “If only I could fly there.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हृदयँ | हृदय में | in the heart |
| सोचु | चिंता | anxiety |
| बड़ | बड़ी | great |
| कछु | कुछ भी | anything |
| न | नहीं | not |
| सोहाई | अच्छा लगता | seemed pleasing |
| अस | ऐसा | thus |
| जानहिं | सोचते हैं | thinks |
| जियँ | मन में | within his mind |
| जाउँ | मैं पहुँच जाऊँ | may I reach there |
| उड़ाई | उड़कर | by flying |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.158
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 474
- सहायक विषय
- श्रीभरत-शत्रुघ्नका आगमन और शोक
- मुद्रित पृष्ठ
- 474, 475
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।