अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
गे नहाइ गुर पहीं रघुराई। बंदि चरन बोले रुख पाई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दश्रीरघुनाथजी स्नान करके गुरु वसिष्ठजीके पास गये और चरणोंकी वन्दना करके उनका रुख पाकर बोले—हे नाथ! भरत, अवधपुरवासी तथा माताएँ, सब शोकसे व्याकुल और वनवाससे दुखी हैं॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 586 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
गे नहाइ गुर पहीं रघुराई। बंदि चरन बोले रुख पाई।।
नाथ भरतु पुरजन महतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी।।
स्रोत अभिलेख 2.29 · पुस्तक पृ. 586, 586
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 गे नहाइ गुर पहीं रघुराई। बंदि चरन बोले रुख पाई।।
English explanation
After bathing, Rama went to his guru. Bowing at his feet and finding him receptive, Rama spoke.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गे | गए | went |
| नहाइ | स्नान करके | after bathing |
| गुर | गुरु वसिष्ठ के | to his guru, Vasishtha |
| पहीं | पास | near |
| रघुराई | रघुवंश के स्वामी राम | Rama, lord of Raghu’s lineage |
| बंदि | वंदना करके | having bowed to |
| चरन | चरणों की | his feet |
| बोले | बोले | spoke |
| रुख | अनुकूल अभिप्राय | a receptive disposition |
| पाई | पाकर | having found |
2 नाथ भरतु पुरजन महतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी।।
English explanation
Master, Bharata, the townspeople, and the mothers are distraught with grief and distressed by the exile.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नाथ | हे नाथ | O master |
| भरतु | भरत | Bharata, Rama’s brother |
| पुरजन | नगरवासी | townspeople |
| महतारी | माताएँ | the mothers |
| सोक | शोक से | with grief |
| बिकल | व्याकुल | distraught |
| बनबास | वनवास से | by the forest exile |
| दुखारी | दुःखी | distressed |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.29
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 586
- सहायक विषय
- जनक-सुनयना-संवाद, भरतजीकी महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 586, 586
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