अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे।।
मूल पाठ
गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे।।
जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे।।
स्रोत अभिलेख 2.8 · पुस्तक पृ. 409, 410
भावार्थ
मूल पाठ के बादगुरुजीसे कहकर उन सबको वर्षाशन (वर्षभरका भोजन) दिये और आदर, दान तथा विनयसे उन्हें वशमें कर लिया। फिर याचकोंको दान और मान देकर सन्तुष्ट किया तथा मित्रोंको पवित्र प्रेमसे प्रसन्न किया॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 409 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे।।
English explanation
After speaking to his preceptor, Rama gave the Brahmins annual maintenance allowances and won their hearts through respect, gifts, and humility.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गुर | गुरु से | his preceptor |
| सन | से | to |
| कहि | कहकर | having spoken |
| बरषासन | वार्षिक निर्वाह-वृत्तियाँ | annual maintenance allowances |
| दीन्हे | दीं | gave |
| आदर | सम्मान से | through respect |
| दान | दान से | through gifts |
| बिनय | विनम्रता से | through humility |
| बस | वश में, अनुरक्त | won over |
| कीन्हे | किया | made |
2 जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे।।
English explanation
Rama satisfied the supplicants with gifts and honor, and pleased his friends with pure affection.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जाचक | याचकों को | the supplicants |
| दान | दान से | with gifts |
| मान | सम्मान से | with honor |
| संतोषे | संतुष्ट किया | satisfied |
| मीत | मित्रों को | his friends |
| पुनीत | पवित्र | pure |
| प्रेम | प्रेम से | with affection |
| परितोषे | प्रसन्न किया | pleased |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.8
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 409
- सहायक विषय
- श्रीराम-सीता-लक्ष्मणका वनगमन और नगर-निवासियोंको सोये छोड़कर आगे बढ़ना
- मुद्रित पृष्ठ
- 409, 410
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।