अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी।।
मूल पाठ
गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी।।
भरतहि धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी।।
स्रोत अभिलेख 2.259 · पुस्तक पृ. 559, 560
भावार्थ
मूल पाठ के बादभरतजीपर गुरुजीका स्नेह देखकर श्रीरामचन्द्रजीके हृदयमें विशेष आनन्द हुआ। भरतजीको धर्मधुरन्धर और तन, मन, वचनसे अपना सेवक जानकर—॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 559 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी।।
English explanation
Seeing the guru’s affection for Bharata, Rama felt exceptional joy in his heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गुरु | गुरु वसिष्ठ का | of the guru Vashishtha |
| अनुराग | प्रेम | affection |
| भरत | राम के भाई भरत | Bharata, Rama’s brother |
| पर | के प्रति | toward |
| देखी | देखकर | having seen |
| राम | राम के | Rama’s |
| ह्दयँ | हृदय में | in the heart |
| आनंदु | आनंद | joy |
| बिसेषी | विशेष | exceptional |
2 भरतहि धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी।।
English explanation
Knowing Bharata to be an upholder of righteousness and his own servant in body, mind, and speech,
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरतहि | भरत को | Bharata |
| धरम | धर्म का | of righteousness |
| धुरंधर | भार सँभालने वाला | a steadfast upholder |
| जानी | जानकर | knowing |
| निज | अपना | his own |
| सेवक | सेवक | servant |
| तन | शरीर से | in body |
| मानस | मन से | in mind |
| बानी | वाणी से | in speech |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.259
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 559
- सहायक विषय
- श्रीवसिष्ठजीका भाषण
- मुद्रित पृष्ठ
- 559, 560
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।