अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा।।
मूल पाठ
कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा।।
तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि। जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि।।
स्रोत अभिलेख 2.242 · पुस्तक पृ. 545, 545
भावार्थ
मूल पाठ के बादउस समय न तो कोई कुछ कहता है, न कोई कुछ पूछता है। मन प्रेमसे परिपूर्ण है, वह अपनी गतिसे खाली है (अर्थात् संकल्प-विकल्प और चाञ्चल्यसे शून्य है)। उस अवसरपर केवट (निषादराज) धीरज धर और हाथ जोड़कर प्रणाम करके विनती करने लगा—॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 545 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा।।
English explanation
No one says anything, and no one asks anything; the heart, filled with love, has no awareness of its own state.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कोउ | कोई | anyone |
| किछु | कुछ | anything |
| कहइ | कहता है | says |
| न | नहीं | not |
| कोउ | कोई | anyone |
| किछु | कुछ | anything |
| पूँछा | पूछता है | asks |
| प्रेम | प्रेम से | with love |
| भरा | भरा हुआ | filled |
| मन | मन; हृदय | mind; heart |
| निज | अपनी | its own |
| गति | दशा; स्थिति | state; condition |
| छूँछा | खाली; सुध से रहित | empty; devoid of awareness |
2 तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि। जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि।।
English explanation
At that moment, the Nishada chief composed himself, joined his hands, bowed, and made a humble submission.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तेहि | उस | that |
| अवसर | समय; अवसर पर | at the moment |
| केवटु | केवट; यहाँ निषादराज गुह | boatman; here the Nishada chief Guha |
| धीरजु | धैर्य | composure; courage |
| धरि | धारण करके | having gathered |
| जोरि | जोड़कर | joining |
| पानि | हाथ | hands |
| बिनवत | विनती करते हैं | humbly submits |
| प्रनामु | प्रणाम | obeisance |
| करि | करके | having made |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.242
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 545
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 545, 545
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।