अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी।।
मूल पाठ
कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी।।
लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं।।
स्रोत अभिलेख 2.141 · पुस्तक पृ. 460, 461
भावार्थ
मूल पाठ के बादकृपाके समुद्र प्रभु श्रीरामचन्द्रजी दु:खी हो जाते हैं, किन्तु फिर कुसमय समझकर धीरज धारण कर लेते हैं। श्रीरामचन्द्रजीको दुखी देखकर सीताजी और लक्ष्मणजी भी व्याकुल हो जाते हैं, जैसे किसी मनुष्यकी परछाहीं उस मनुष्यके समान ही चेष्टा करती है॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 461 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी।।
English explanation
The Lord Rama, an ocean of compassion, becomes sorrowful, but maintains composure considering the adverse circumstances.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कृपासिंधु | करुणा के समुद्र | ocean of compassion |
| प्रभु | स्वामी राम | the Lord Rama |
| होहिं | हो जाते हैं | becomes |
| दुखारी | दुखी | sorrowful |
| धीरजु | धैर्य | composure |
| धरहिं | धारण करते हैं | maintains |
| कुसमउ | प्रतिकूल समय | adverse circumstances |
| बिचारी | विचार करके | considering |
2 लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं।।
English explanation
Seeing Rama’s condition, Sita and Lakshmana become distressed, just as a shadow follows a person.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लखि | देखकर | seeing |
| सिय | सीता | Sita |
| लखनु | लक्ष्मण | Lakshmana |
| बिकल | व्याकुल | distressed |
| होइ | हो | become |
| जाहीं | जाते हैं | come to be |
| जिमि | जैसे | just as |
| पुरुषहि | मनुष्य का | a person |
| अनुसर | अनुसरण करती है | follows |
| परिछाहीं | छाया | a shadow |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.141
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 461
- सहायक विषय
- चित्रकूटमें निवास, कोल-भीलोंके द्वारा सेवा
- मुद्रित पृष्ठ
- 460, 461
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।