अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई।।
मूल पाठ
कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई।।
करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा।।
स्रोत अभिलेख 2.106 · पुस्तक पृ. 431, 432
भावार्थ
मूल पाठ के बादउन्होंने अपने श्रीमुखसे सीताजी, लक्ष्मणजी और सखा गुहको तीर्थराजकी महिमा कहकर सुनायी। तदनन्तर प्रणाम करके, वन और बगीचोंको देखते हुए और बड़े प्रेमसे माहात्म्य कहते हुए—॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 431 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई।।
English explanation
With his own gracious lips, Rama recounted the glory of Prayag, king of sacred places, to Sita, Lakshmana, and his friend.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कहि | कहकर | recounting |
| सिय | सीता को | to Sita |
| लखनहि | लक्ष्मण को | to Lakshmana |
| सखहि | सखा निषादराज गुह को | to his friend Guha, the Nishada chief |
| सुनाई | सुनाई | told; made known |
| श्रीमुख | अपने पूज्य मुख से | with his own gracious lips |
| तीरथराज | तीर्थों के राजा प्रयाग की | of Prayag, king of sacred places |
| बड़ाई | महिमा | glory |
2 करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा।।
English explanation
After offering reverence, Rama viewed the woods and gardens, speaking of Prayag’s greatness with deep affection.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करि | करके | having offered |
| प्रनामु | प्रणाम | reverent salutation |
| देखत | देखते हुए | while viewing |
| बन | वन | woods |
| बागा | बाग | gardens |
| कहत | कहते हुए | speaking of |
| महातम | माहात्म्य; पवित्र महिमा | sacred greatness |
| अति | बहुत | very great |
| अनुरागा | प्रेम से | with affection |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.106
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 431
- सहायक विषय
- प्रयाग पहुँचना, श्रीराम-भरद्वाज-संवाद, यमुनातीरनिवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 431, 432
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।