अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें।।
मूल पाठ
करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें।।
सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई।।
स्रोत अभिलेख 2.88 · पुस्तक पृ. 416, 416
भावार्थ
मूल पाठ के बाददण्डवत् करके भेंट सामने रखकर वह अत्यन्त प्रेमसे प्रभुको देखने लगा। श्रीरघुनाथजीने स्वाभाविक स्नेहके वश होकर उसे अपने पास बैठाकर कुशल पूछी॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 416 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें।।
English explanation
After prostrating and placing the gifts before him, Guha gazed at Lord Rama with deep affection.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करि | करके | having performed |
| दंडवत | भूमि पर लेटकर प्रणाम | full prostration |
| भेंट | उपहार | gifts |
| धरि | रखकर | having placed |
| आगें | सामने | before him |
| प्रभुहि | प्रभु राम को | at Lord Rama |
| बिलोकत | देखते हुए | gazing |
| अति | अत्यंत | deeply |
| अनुरागें | प्रेम से | with affection |
2 सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई।।
English explanation
Overcome by natural affection, Rama seated Guha nearby and asked about his well-being.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सहज | स्वाभाविक | natural |
| सनेह | स्नेह | affection |
| बिबस | वश में; अभिभूत | overcome by |
| रघुराई | रघुकुल के स्वामी राम | Rama, lord of Raghu’s lineage |
| पूँछी | पूछी | asked about |
| कुसल | कुशल-क्षेम | well-being |
| निकट | पास | nearby |
| बैठाई | बैठाकर | having seated him |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.88
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 416
- सहायक विषय
- श्रीरामका शृङ्गवेरपुर पहुँचना, निषादके द्वारा सेवा
- मुद्रित पृष्ठ
- 416, 416
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।