अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दजैसे तपानेसे सोनेपर आब (चमक) आ जाती है, वैसे ही प्रियतमके चरणोंमें प्रेमका नियम निबाहनेसे प्रेमी सेवकका गौरव बढ़ जाता है। भरतजीके वचन सुनकर बीच त्रिवेणीमेंसे सुन्दर मङ्गल देनेवाली कोमल वाणी हुई॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 514 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें।।
भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी।।
स्रोत अभिलेख 2.205 · पुस्तक पृ. 513, 514
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें।।
English explanation
As gold’s purity increases through heating, so love is refined by keeping one’s steadfast commitment to the beloved’s feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कनकहिं | सोने की, सोने में | in gold |
| बान | शुद्धता, खरेपन का स्तर | purity, fineness |
| चढ़इ | बढ़ता है | increases |
| जिमि | जैसे | just as |
| दाहें | तपाने से | through heating |
| तिमि | वैसे ही | so too |
| प्रियतम | परम प्रिय के | of the beloved |
| पद | चरणों के प्रति | toward the feet |
| नेम | नियम, दृढ़ निष्ठा | vow, steadfast commitment |
| निबाहें | निभाने से | by faithfully maintaining |
2 भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी।।
English explanation
On hearing Bharata’s words, a gentle voice bestowing auspicious blessings arose from the midst of the three-river confluence.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरत | राम के भाई भरत के | of Bharata, Rama’s brother |
| बचन | वचन | words |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| माझ | बीच में, मध्य से | in, from the midst |
| त्रिबेनी | तीन नदियों का संगम | the three-river confluence |
| भइ | हुई, प्रकट हुई | arose, became manifest |
| मृदु | कोमल | gentle |
| बानि | वाणी | voice |
| सुमंगल | शुभ मंगल | auspicious blessings |
| देनी | देने वाली | bestowing |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.205
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 514
- सहायक विषय
- भरतजीका प्रयाग जाना और भरत-भरद्वाज-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 513, 514
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।