अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दइस जगत्रूपी रात्रिमें योगीलोग जागते हैं, जो परमार्थी हैं और प्रपञ्च (मायिक जगत्) से छूटे हुए हैं। जगत्में जीवको जागा हुआ तभी जानना चाहिये जब सम्पूर्ण भोग-विलासोंसे वैराग्य हो जाय॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 420 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी।।
जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब जब बिषय बिलास बिरागा।।
स्रोत अभिलेख 2.93 · पुस्तक पृ. 420, 421
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी।।
English explanation
In this night that is the world, yogis remain awake—seekers of the highest truth, detached from worldly entanglements.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| एहिं | इस में | in this |
| जग | संसाररूपी | world-like; the world as |
| जामिनि | रात | night |
| जागहिं | जागते हैं | remain awake |
| जोगी | योगी; योग के साधक | yogis; practitioners of yoga |
| परमारथी | परम सत्य के साधक | seekers of the highest truth |
| प्रपंच | सांसारिक प्रपंच से | from worldly entanglements |
| बियोगी | अलग; विरक्त | detached |
2 जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब जब बिषय बिलास बिरागा।।
English explanation
Know that a being has awakened in the world only when detachment from sensual pleasures arises. The repeated 'when' in the supplied text expresses this condition.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जानिअ | जानना चाहिए | one should recognize |
| तबहिं | तभी | only then |
| जीव | जीव; चेतन प्राणी | the individual being |
| जग | संसार में | in the world |
| जागा | जाग गया | has awakened |
| जब | जब | when |
| जब | जब; शर्त की पुनरुक्ति | when; repeated condition marker |
| बिषय | इंद्रिय-विषयों के | of sensory objects |
| बिलास | भोग-विलास से | from enjoyment and pleasure |
| बिरागा | वैराग्य हो गया | has become detached |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.93
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 420
- सहायक विषय
- लक्ष्मण-निषाद-संवाद, श्रीराम-सीतासे सुमन्त्रका संवाद, सुमन्त्रका लौटना
- मुद्रित पृष्ठ
- 420, 421
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।