अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दएक भी युक्ति भरतजीके मनमें न ठहरी। सोचते-ही-सोचते रात बीत गयी। भरतजी प्रात:काल स्नान करके और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको सिर नवाकर बैठे ही थे कि ऋषि वसिष्ठजीने उनको बुलवा भेजा॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 555 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी।।
प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठए रिषयँ बोलाई।।
स्रोत अभिलेख 2.253 · पुस्तक पृ. 554, 555
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी।।
English explanation
Not a single plan settled in his mind; Bharata's night passed in thought.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| एकउ | एक भी | even one |
| जुगुति | युक्ति या उपाय | plan or means |
| न | नहीं | not |
| मन | मन में | in the mind |
| ठहरानी | निश्चित हुई | became settled |
| सोचत | सोचते हुए | while thinking |
| भरतहि | भरत की | for Bharata |
| रैनि | रात | night |
| बिहानी | बीत गई | passed away |
2 प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठए रिषयँ बोलाई।।
English explanation
In the morning, Bharata bathed and bowed his head to the Lord; just as he sat down, the sage sent for him.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रात | प्रातःकाल | in the morning |
| नहाइ | स्नान करके | having bathed |
| प्रभुहि | प्रभु राम को | to Lord Rama |
| सिर | सिर | head |
| नाई | झुकाकर | having bowed |
| बैठत | बैठते ही | just as he sat down |
| पठए | भेजे | sent messengers |
| रिषयँ | ऋषि वसिष्ठ ने | by the sage Vasishtha |
| बोलाई | बुलाने के लिए | to summon him |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.253
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 555
- सहायक विषय
- वनवासियोंद्वारा भरतजीकी मण्डलीका सत्कार, कैकेयीका पश्चात्ताप
- मुद्रित पृष्ठ
- 554, 555
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।