अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
ईति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दजैसे ईतिके भयसे दु:खी हुई और तीनों (आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक) तापों तथा क्रूर ग्रहों और महामारियोंसे पीडि़त प्रजा किसी उत्तम देश और उत्तम राज्यमें जाकर सुखी हो जाय, भरतजीकी गति (दशा) ठीक उसी प्रकारकी हो रही है॥ २॥ [अधिक जल बरसना, न बरसना, चूहोंका उत्पात, टिड्डियाँ, तोते और दूसरे राजाकी चढ़ाई— खेतोंमें बाधा देनेवाले इन छ: उपद्रवोंको 'ईति कहते हैं।]
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 539 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
ईति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी।।
जाइ सुराज सुदेस सुखारी। होहिं भरत गति तेहि अनुहारी।।
स्रोत अभिलेख 2.235 · पुस्तक पृ. 539, 540
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 ईति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी।।
English explanation
As though a people distressed by calamities and fear, afflicted by the three kinds of suffering, adverse planetary influences, and pestilence—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ईति | फसल आदि को नष्ट करने वाली विपत्तियाँ | calamities affecting crops and livelihood |
| भीति | भय | fear |
| जनु | मानो | as though |
| प्रजा | प्रजा | the people |
| दुखारी | दुखी | distressed |
| त्रिबिध | तीन प्रकार के | threefold |
| ताप | संतापों से | sufferings |
| पीड़ित | पीड़ित | afflicted |
| ग्रह | ग्रहों के अनिष्ट से | by adverse planetary influences |
| मारी | महामारी से | by pestilence |
2 जाइ सुराज सुदेस सुखारी। होहिं भरत गति तेहि अनुहारी।।
English explanation
Might become happy on reaching a good land under good rule; Bharata’s condition was like theirs.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जाइ | जाकर | having gone |
| सुराज | अच्छे शासन वाले | well-governed |
| सुदेस | अच्छे देश में | to a good land |
| सुखारी | सुखी | happy |
| होहिं | हो जाएँ | become |
| भरत | भरत की | Bharata’s |
| गति | दशा | condition |
| तेहि | उसी के | that very condition |
| अनुहारी | समान | like |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.235
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 539
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 539, 540
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।