अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना।।
मूल पाठ
आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना।।
जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी। तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी।।
स्रोत अभिलेख 2.244 · पुस्तक पृ. 546, 547
भावार्थ
मूल पाठ के बाददयाकी खान, सुजान भगवान् श्रीरामजीने सब लोगोंको दुखी (मिलनेके लिये व्याकुल) जाना। तब जो जिस भावसे मिलनेका अभिलाषी था, उस-उसका उस-उस प्रकारका रुख रखते हुए (उसकी रुचिके अनुसार)॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 546 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना।।
English explanation
AI-draft meaning: Rama, the compassionate and all-knowing Lord, understood the distress of all the people.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आरत | दुःख से व्याकुल | distressed |
| लोग | लोगों को | the people |
| राम | भगवान राम ने | Lord Rama |
| सबु | सब कुछ; सारी व्यथा | everything; all their distress |
| जाना | जान लिया | understood |
| करुनाकर | करुणा के भंडार | a fountain of compassion |
| सुजान | सबके मन को जानने वाले | knowing everyone's heart |
| भगवाना | भगवान | the Lord |
2 जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी। तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी।।
English explanation
Whatever feeling each person wished to meet him with, Rama responded in keeping with that person's wish.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जो | जो व्यक्ति | whoever |
| जेहि | जिस | with whichever |
| भायँ | भाव से | feeling or disposition |
| रहा | था | was |
| अभिलाषी | इच्छा रखने वाला | desirous |
| तेहि | उस | that |
| तेहि | उस व्यक्ति | respective person |
| कै | की | of |
| तसि | वैसी | such |
| तसि | वैसी ही | corresponding in each case |
| रुख | इच्छा; मन का रुख | wish or inclination |
| राखी | रखी; उसका मान किया | honored |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.244
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 546
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 546, 547
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।