अयोध्याकाण्ड · दोहा 243 · दोहा/सोरठा
जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ।
जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ।
सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ।।243।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.243 · पुस्तक पृ. 546, 546
भावार्थ और शब्दार्थ
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1जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ।
जिस निषादराज को देखकर मुनिराज हर्षित होकर लक्ष्मण से भी अधिक स्नेह से मिले—
English explanation
Seeing that Nishada chief, the chief of sages joyfully greeted him with even greater affection than he had shown Lakshmana—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जेहि | जिस निषादराज को | that Nishada chief whom |
| लखि | देखकर | having seen |
| लखनहु | लक्ष्मण से भी | even than Lakshmana |
| तें | से | than |
| अधिक | अधिक स्नेह से | with greater affection |
| मिले | मिले; गले लगे | greeted; embraced |
| मुदित | प्रसन्न होकर | joyfully |
| मुनिराउ | मुनिराज वसिष्ठ | Vasishtha, chief of sages |
2 सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ।।243।।
वह सीता के पति राम के भजन का प्रत्यक्ष प्रताप और प्रभाव है।
English explanation
That is the manifest power and influence of devotion to Rama, Sita’s husband.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सो | वह | that |
| सीतापति | सीता के पति राम के | of Rama, Sita’s husband |
| भजन | भजन; भक्तिपूर्ण स्मरण | devotion; reverent remembrance |
| को | का | of |
| प्रगट | प्रत्यक्ष | manifest |
| प्रताप | प्रताप; महिमा की शक्ति | power; glorious potency |
| प्रभाउ | प्रभाव | influence; efficacy |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 243
- स्रोत अभिलेख
- 2.243
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 546, 546
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