अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जूआरिहि आपन दाऊ।।
मूल पाठ
आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जूआरिहि आपन दाऊ।।
सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ। नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ।।
स्रोत अभिलेख 2.258 · पुस्तक पृ. 559, 559
भावार्थ
मूल पाठ के बादआर्त (दुखी) लोग कभी विचारकर नहीं कहते। जुआरीको अपना ही दाँव सूझता है। मुनिके वचन सुनकर श्रीरघुनाथजी कहने लगे—हे नाथ! उपाय तो आपहीके हाथ है॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 559 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जूआरिहि आपन दाऊ।।
English explanation
Distressed people never speak with due reflection; a gambler sees only his own move.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आरत | व्याकुल लोग | distressed people |
| कहहिं | कहते हैं | say |
| बिचारि | विचार करके | after reflecting |
| न | नहीं | not |
| काऊ | कभी भी | ever |
| सूझ | सूझता है | occurs to |
| जूआरिहि | जुआरी को | to a gambler |
| आपन | अपना | his own |
| दाऊ | दाँव | gambling move or stake |
2 सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ। नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ।।
English explanation
Hearing the sage’s words, Rama says, ‘Master, the solution lies in your hands alone.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनि | सुनकर | having heard |
| मुनि | मुनि वसिष्ठ के | of the sage Vashishtha |
| बचन | वचन | words |
| कहत | कहते हैं | says |
| रघुराऊ | रघुवंश के स्वामी राम | Rama, lord of Raghu’s lineage |
| नाथ | हे स्वामी | O master |
| तुम्हारेहि | आपके ही | yours alone |
| हाथ | हाथ में | in the hands |
| उपाऊ | उपाय | solution |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.258
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 559
- सहायक विषय
- श्रीवसिष्ठजीका भाषण
- मुद्रित पृष्ठ
- 559, 559
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।