अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दऐसा कहकर कुटिल कैकेयी उठ खड़ी हुई, मानो क्रोधकी नदी उमड़ी हो। वह नदी पापरूपी पहाड़से प्रकट हुई है और क्रोधरूपी जलसे भरी है; [ऐसी भयानक है कि] देखी नहीं जाती!॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 372 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी।।
पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई।।
स्रोत अभिलेख 2.34 · पुस्तक पृ. 372, 372
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी।।
English explanation
Saying this, the devious Kaikeyi rose to her feet, as though a river of anger had swollen.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अस | ऐसा | thus |
| कहि | कहकर | having said |
| कुटिल | कुटिल कैकेयी | the devious Kaikeyi |
| भई | हो गई | became |
| उठि | उठकर | having risen |
| ठाढ़ी | खड़ी | standing |
| मानहुँ | मानो | as though |
| रोष | क्रोध | anger |
| तरंगिनि | नदी | river |
| बाढ़ी | उमड़ पड़ी | swelled |
2 पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई।।
English explanation
That river emerged from the mountain of sin, so full of the waters of anger that one could not bear to behold it.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पाप | पाप का | of sin |
| पहार | पहाड़ से | from the mountain |
| प्रगट | प्रकट | manifest |
| भइ | हुई | became |
| सोई | वही नदी | that very river |
| भरी | भरी हुई | filled |
| क्रोध | क्रोधरूपी | of anger |
| जल | जल से | with water |
| जाइ | जा सके | could be |
| न | नहीं | not |
| जोई | देखी | beheld |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.34
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 372
- सहायक विषय
- दशरथ-कैकेयी-संवाद और दशरथ-शोक, सुमन्त्रका महलमें जाना और वहाँसे लौटकर श्रीरामजीको महलमें भेजना
- मुद्रित पृष्ठ
- 372, 372
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।