अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
अनुचित नाथ न मानब मोरा। भरत हमहि उपचार न थोरा।।
मूल पाठ
अनुचित नाथ न मानब मोरा। भरत हमहि उपचार न थोरा।।
कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें। नाथ साथ धनु हाथ हमारें।।
स्रोत अभिलेख 2.229 · पुस्तक पृ. 534, 535
भावार्थ
मूल पाठ के बादहे नाथ! मेरा कहना अनुचित न मानियेगा। भरतने हमें कम नहीं प्रचारा है (हमारे साथ कम छेड़छाड़ नहीं की है)। आखिर कहाँतक सहा जाय और मन मारे रहा जाय, जब स्वामी हमारे साथ हैं और धनुष हमारे हाथमें है!॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 534 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 अनुचित नाथ न मानब मोरा। भरत हमहि उपचार न थोरा।।
English explanation
My lord, do not regard my words as improper. Bharata’s mistreatment of us has been no small matter.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अनुचित | अनुचित; अनुचित बात | improper; inappropriate |
| नाथ | हे स्वामी राम | O lord Rama |
| न | नहीं; मत | not; do not |
| मानब | मानिए; समझिए | regard; consider |
| मोरा | मेरी बात | my words |
| भरत | राम के भाई भरत | Bharata, Rama’s brother |
| हमहि | हमारे प्रति; हमें | toward us; to us |
| उपचार | व्यवहार; यहाँ दुर्व्यवहार | treatment; here, mistreatment |
| न | नहीं | not |
| थोरा | थोड़ा; मामूली | little; slight |
2 कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें। नाथ साथ धनु हाथ हमारें।।
English explanation
How long should we endure and keep our feelings suppressed? Our lord is with us, and the bow is in our hands.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कहँ | कहाँ तक; कब तक | how far; how long |
| लगि | तक | until; up to |
| सहिअ | सहा जाए; हम सहें | should one endure; should we endure |
| रहिअ | रहा जाए; हम रहें | should one remain; should we remain |
| मनु | मन; मन की भावनाएँ | mind; feelings |
| मारें | दबाकर; वश में रखकर | suppressing; restraining |
| नाथ | स्वामी राम | our lord Rama |
| साथ | साथ हैं | is with us |
| धनु | धनुष | bow |
| हाथ | हाथ में | in the hand |
| हमारें | हमारे | our |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.229
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 534
- सहायक विषय
- श्रीसीताजीका स्वप्न, श्रीरामजीको कोल-किरातोंद्वारा भरतजीके आगमनकी सूचना, रामजीका शोक, लक्ष्मणजीका क्रोध
- मुद्रित पृष्ठ
- 534, 535
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।