अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दपरन्तु कोई भी काम हो, उसे अनुचित-उचित खूब समझ-बूझकर किया जाय तो सब कोई अच्छा कहते हैं। वेद और विद्वान् कहते हैं कि जो बिना विचारे जल्दीमें किसी कामको करके पीछे पछताते हैं, वे बुद्धिमान् नहीं हैं॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 536 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ।।
सहसा करि पाछैं पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं।।
स्रोत अभिलेख 2.231 · पुस्तक पृ. 535, 536
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ।।
English explanation
Whatever the undertaking, improper or proper, everyone says it is best to act after careful consideration.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अनुचित | अनुचित | improper |
| उचित | उचित | proper |
| काजु | कार्य | undertaking |
| किछु | कोई भी | whatever |
| होऊ | हो | it may be |
| समुझि | समझ-विचारकर | after considering carefully |
| करिअ | करना चाहिए | one should do |
| भल | अच्छा है | is best |
| कह | कहता है | says |
| सबु | सब | every |
| कोऊ | कोई; व्यक्ति | person |
2 सहसा करि पाछैं पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं।।
English explanation
Those who act rashly and regret it afterward are not wise, say the Vedas and the learned.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सहसा | बिना विचार; उतावली में | rashly; without reflection |
| करि | करके | having acted |
| पाछैं | बाद में | afterward |
| पछिताहीं | पछताते हैं | regret |
| कहहिं | कहते हैं | say |
| बेद | वेद | the Vedas |
| बुध | ज्ञानी लोग | the learned |
| ते | वे लोग | those people |
| बुध | बुद्धिमान | wise |
| नाहीं | नहीं हैं | are not |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.231
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 536
- सहायक विषय
- श्रीसीताजीका स्वप्न, श्रीरामजीको कोल-किरातोंद्वारा भरतजीके आगमनकी सूचना, रामजीका शोक, लक्ष्मणजीका क्रोध
- मुद्रित पृष्ठ
- 535, 536
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।