अरण्यकाण्ड · दोहा 39 (ख) · दोहा/सोरठा
सुखि मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं।
सुखि मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं।
जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं।।39(ख)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.39 · पुस्तक पृ. 671, 672
भावार्थ और शब्दार्थ
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1 सुखि मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं।
अत्यंत गहरे जल में सभी मछलियाँ समान रूप से सुखी थीं।
English explanation
All the fish were equally content in the exceedingly deep water.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुखि | सुखी | content |
| मीन | मछलियाँ | fish |
| सब | सभी | all |
| एकरस | एक समान; निरंतर | uniformly; steadily |
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| अगाध | बहुत गहरा; अथाह | deep; unfathomable |
| जल | जल | water |
| माहिं | में | in |
2 जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं।।39(ख)।।
जैसे धर्मशील लोगों के दिन सुख से युक्त बीतते हैं।
English explanation
Just as the days of virtuous people pass in happiness.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जथा | जैसे | just as |
| धर्मसीलन्ह | धर्मशील लोगों | people of virtuous conduct |
| के | के | of |
| दिन | दिन | days |
| सुख | सुख से | with happiness |
| संजुत | युक्त | endowed |
| जाहिं | बीतते हैं | pass |
| ख | पद-संदर्भ चिह्न ‘ख’ | verse reference marker ‘ख’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 39 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 3.39
- सहायक विषय
- शबरीपर कृपा, नवधा भक्ति-उपदेश और पम्पासरकी ओर प्रस्थान
- मुद्रित पृष्ठ
- 671, 672
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