अरण्यकाण्ड · दोहा 5 (क) · दोहा/सोरठा
सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।
सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।
जसु गावत श्रुति चारि अजहु तुलसिका हरिहि प्रिय।।5(क)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.5 · पुस्तक पृ. 625, 627
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।
स्वभाव से अपवित्र कही गई स्त्री भी पति की सेवा करके शुभ गति पाती है।
English explanation
Even a woman described as impure by nature attains a blessed state by serving her husband.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सहज | स्वभावतः | by nature |
| अपावनि | अपवित्र | impure |
| नारि | स्त्री | woman |
| पति | पति की | her husband |
| सेवत | सेवा करते हुए | by serving |
| सुभ | शुभ | blessed |
| गति | आध्यात्मिक अवस्था | spiritual state |
| लहइ | पाती है | attains |
2 जसु गावत श्रुति चारि अजहु तुलसिका हरिहि प्रिय।।5(क)।।
इसी कारण तुलसी आज भी हरि को प्रिय है, और चारों वेद उसका यश गाते हैं।
English explanation
Thus Tulasi remains dear to Hari even today, and all four Vedas sing her glory.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जसु | यश | glory |
| गावत | गाते हैं | sing |
| श्रुति | वेद | Vedas |
| चारि | चारों | all four |
| अजहु | आज भी | even now |
| तुलसिका | तुलसी, पवित्र तुलसी का व्यक्तिरूप | Tulasi, the personified sacred basil |
| हरिहि | हरि अर्थात विष्णु को | to Hari, Vishnu |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| क | पद-संदर्भ का चिह्न (क) | verse reference marker (a) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 5 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 3.5
- सहायक विषय
- श्रीसीता-अनसूया-मिलन और श्रीसीताजीको अनसूयाजीका पातिव्रतधर्म कहना
- मुद्रित पृष्ठ
- 625, 627
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