अरण्यकाण्ड · दोहा 4 · दोहा
बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि।
बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि।
चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि॥ ४॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.4 · पुस्तक पृ. 623, 624
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि।
एआई-प्रारूप: विनती करके और सिर झुकाकर मुनि फिर हाथ जोड़कर कहते हैं।
English explanation
AI draft: Having offered a supplication and bowed his head, the sage speaks again with folded hands.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिनती | विनती; नम्र प्रार्थना | humble supplication |
| करि | करके | having made |
| मुनि | मुनि; ऋषि | the sage |
| नाइ | झुकाकर | having bowed |
| सिरु | सिर | his head |
| कह | कहते हैं | says |
| कर | हाथ | hands |
| जोरि | जोड़कर | having joined together |
| बहोरि | फिर; पुनः | again |
2चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि॥ ४॥
एआई-प्रारूप: हे नाथ, मेरी बुद्धि आपके चरण-कमलों को कभी न छोड़े।
English explanation
AI draft: O Lord, may my mind never forsake your lotus feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चरन | आपके चरण | your feet |
| सरोरुह | कमल; चरणों की कमल से उपमा | lotuses, describing the feet |
| नाथ | हे स्वामी | O Lord |
| जनि | न; निषेधसूचक | not; expressing a negative wish |
| कबहुँ | कभी | ever |
| तजै | छोड़े; त्यागे | may forsake |
| मति | बुद्धि; मन | mind; understanding |
| मोरि | मेरी | my |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा 4
- स्रोत अभिलेख
- 3.4
- सहायक विषय
- अत्रि-मिलन एवं स्तुति
- मुद्रित पृष्ठ
- 623, 624
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।