अरण्यकाण्ड · दोहा 3 · दोहा/सोरठा
प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि।
प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि।
मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत।।3।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.3 · पुस्तक पृ. 622, 623
भावार्थ और शब्दार्थ
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1प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि।
प्रभु राम आसन पर विराजमान थे; मुनि ने उनकी शोभा को आँखें भरकर देखा।
English explanation
Lord Rama was seated; the sage gazed to his eyes’ content upon his beauty.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रभु | प्रभु राम | Lord Rama |
| आसन | आसन पर | on a seat |
| आसीन | बैठे हुए; विराजमान | seated |
| भरि | भरकर; पूरी तृप्ति तक | fully; to contentment |
| लोचन | आँखें | eyes |
| सोभा | शोभा; सुंदरता | beauty; splendor |
| निरखि | देखकर; निहारकर | having gazed upon |
2 मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत।।3।।
अत्यंत प्रवीण श्रेष्ठ मुनि अत्रि हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे।
English explanation
Atri, the eminent and deeply discerning sage, joined his hands and began offering praise.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मुनिबर | श्रेष्ठ मुनि अत्रि | Atri, the eminent sage |
| परम | अत्यंत | supremely; very |
| प्रबीन | प्रवीण; विवेकवान | accomplished; discerning |
| जोरि | जोड़कर | joining |
| पानि | हाथ | hands |
| अस्तुति | स्तुति; प्रशंसा | praise |
| करत | करते हैं; करने लगे | offers; began offering |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 3
- स्रोत अभिलेख
- 3.3
- सहायक विषय
- अत्रि-मिलन एवं स्तुति
- मुद्रित पृष्ठ
- 622, 623
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