अरण्यकाण्ड · दोहा 12 · दोहा/सोरठा
मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर।
मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर।
सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर।।12।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.12 · पुस्तक पृ. 635, 636
भावार्थ और शब्दार्थ
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1मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर।
राम मुनियों के समूह में बैठे, सबकी ओर सम्मुख थे।
English explanation
Rama sat among the assembled sages, facing them all.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मुनि | मुनियों के | of sages |
| समूह | समूह | assembly |
| महँ | में | among |
| बैठे | बैठे | sat |
| सन्मुख | सम्मुख | facing |
| सब | सब | all |
| की | की | their |
| ओर | ओर | direction |
2 सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर।।12।।
मुनि उनके शरद्-चंद्रमा जैसे शरीर को ऐसे निहार रहे थे, मानो चकोरों का समूह चंद्रमा को देख रहा हो।
English explanation
The sages gazed at his form, like the autumn moon, as though they were a flock of chakora birds gazing at the moon.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सरद | शरद ऋतु का | autumn's |
| इंदु | चंद्रमा | moon |
| तन | शरीर / रूप | body or form |
| चितवत | निहारते थे | gazed at |
| मानहुँ | मानो | as though |
| निकर | समूह | a flock |
| चकोर | चंद्रमा को निहारने वाले चकोर पक्षी | moon-gazing chakora birds |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 12
- स्रोत अभिलेख
- 3.12
- सहायक विषय
- सुतीक्ष्णजीका प्रेम, अगस्त्य-मिलन, अगस्त्य-संवाद, रामका दण्डक-वन-प्रवेश और जटायु-मिलन
- मुद्रित पृष्ठ
- 635, 636
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