अरण्यकाण्ड · दोहा 13 · दोहा/सोरठा
गीधराज सैं भैंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ।।
गीधराज सैं भैंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ।।
गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ।।13।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.13 · पुस्तक पृ. 637, 638
भावार्थ और शब्दार्थ
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1गीधराज सैं भैंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ।।
गिद्धराज जटायु से भेंट हुई और अनेक प्रकार से प्रेम बढ़ाया।
English explanation
He met Jatayu, king of vultures, and deepened their affection in many ways.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गीधराज | गिद्धों के राजा जटायु | Jatayu, king of vultures |
| सैं | से | with |
| भैंट | भेंट; मुलाकात | meeting |
| भइ | हुई | took place |
| बहु | अनेक | many |
| बिधि | प्रकार से | in ways |
| प्रीति | प्रेम; स्नेह | affection |
| बढ़ाइ | बढ़ाया | deepened; increased |
2 गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ।।13।।
प्रभु गोदावरी के निकट पत्तों की कुटिया छाकर रहने लगे।
English explanation
The Lord dwelt near the Godavari after building a leaf-thatched hut.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गोदावरी | गोदावरी नदी के | the Godavari River |
| निकट | पास | near |
| प्रभु | प्रभु राम | Lord Rama |
| रहे | रहने लगे | dwelt |
| परन | पत्तों का | of leaves |
| गृह | घर; कुटिया | hut; dwelling |
| छाइ | छाकर; छप्पर बनाकर | having thatched |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 13
- स्रोत अभिलेख
- 3.13
- सहायक विषय
- सुतीक्ष्णजीका प्रेम, अगस्त्य-मिलन, अगस्त्य-संवाद, रामका दण्डक-वन-प्रवेश और जटायु-मिलन
- मुद्रित पृष्ठ
- 637, 638
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