अरण्यकाण्ड · दोहा 37 (क) · दोहा/सोरठा
बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल।
बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल।
सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल।।37(क)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.37 · पुस्तक पृ. 669, 670
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल।
मुझे विरह से व्याकुल, बलहीन और बिल्कुल अकेला जानकर—
English explanation
Knowing me to be distraught with separation, powerless, and utterly alone—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिरह | प्रिय से बिछोह | separation from the beloved |
| बिकल | व्याकुल | distraught |
| बलहीन | बल से रहित | powerless |
| मोहि | मुझे | me |
| जानेसि | उसने जाना | he understood to be |
| निपट | बिल्कुल | utterly |
| अकेल | अकेला | alone |
2 सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल।।37(क)।।
कामदेव ने वन, भौंरों और पक्षियों के साथ मिलकर मुझ पर धावा किया।
English explanation
Cupid, together with the forest, bees, and birds, launched a charge against me.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सहित | के साथ | together with |
| बिपिन | वन | forest |
| मधुकर | भौंरे | bees |
| खग | पक्षी | birds |
| मदन | कामदेव | Cupid, the god of desire |
| कीन्ह | किया | made |
| बगमेल | धावा | a charge; an assault |
| क | पद-संदर्भ का अक्षर ‘क’ | verse-reference marker ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 37 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 3.37
- सहायक विषय
- शबरीपर कृपा, नवधा भक्ति-उपदेश और पम्पासरकी ओर प्रस्थान
- मुद्रित पृष्ठ
- 669, 670
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।