अरण्यकाण्ड · दोहा 16 · दोहा/सोरठा
बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।।
बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।।
तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम।।16।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.16 · पुस्तक पृ. 640, 641
भावार्थ और शब्दार्थ
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1बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।।
जो वचन, कर्म और मन से मुझे अपना आश्रय मानकर निष्काम भजन करते हैं—
English explanation
Those who take me as their refuge in speech, action, and thought, and worship without desire for reward—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बचन | वचन से | in speech |
| कर्म | कर्म से | in action |
| मन | मन से | in thought |
| मोरि | मुझे अपना | me as their |
| गति | आश्रय; परम गंतव्य | refuge; ultimate goal |
| भजनु | भजन; उपासना | devotional worship |
| करहिं | करते हैं | perform |
| निःकाम | फल की इच्छा के बिना | without desire for reward |
2 तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम।।16।।
उनके हृदय-कमल में मैं सदा विश्राम करता हूँ।
English explanation
I always rest in the lotus of their hearts.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तिन्ह | उन भक्तों | those devotees |
| के | के | of |
| हृदय | हृदय | hearts |
| कमल | कमल | lotus |
| महुँ | में | within |
| करउँ | मैं करता हूँ | I take |
| सदा | सदा | always |
| बिश्राम | विश्राम | rest |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 16
- स्रोत अभिलेख
- 3.16
- सहायक विषय
- पञ्चवटी-निवास और श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 640, 641
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