अरण्यकाण्ड · दोहा 10 · दोहा/सोरठा
तब मुनि हृदयँ धीर धीर गहि पद बारहिं बार।
तब मुनि हृदयँ धीर धीर गहि पद बारहिं बार।
निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार।।10।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.1 · पुस्तक पृ. 631, 633
भावार्थ और शब्दार्थ
1तब मुनि हृदयँ धीर धीर गहि पद बारहिं बार।
तब मुनि ने हृदय में धैर्य सँभाला और बार-बार प्रभु के चरण पकड़े। दिए हुए पाठ में ‘धीर धीर’ का दूसरा पद संदिग्ध है।
English explanation
Then the sage steadied his heart and repeatedly clasped the Lord’s feet. The second ‘धीर’ in the supplied text is uncertain.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तब | तब | then |
| मुनि | मुनि | the sage |
| हृदयँ | हृदय में | in his heart |
| धीर | धैर्य | composure |
| धीर | धारण करके; हृदय में धैर्य सँभालकर। | Having gathered or regained composure in his heart. |
| गहि | पकड़कर | clasping |
| पद | चरण | feet |
| बारहिं | बार-बार | repeatedly |
| बार | बार | time |
2 निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार।।10।।
प्रभु को अपने आश्रम में लाकर मुनि ने विविध प्रकार से उनकी पूजा की।
English explanation
Bringing the Lord to his own hermitage, the sage worshipped him in various ways.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निज | अपने | his own |
| आश्रम | आश्रम में | to the hermitage |
| प्रभु | प्रभु को | the Lord |
| आनि | लाकर | bringing |
| करि | की | performed |
| पूजा | पूजा | worship |
| बिबिध | विविध | various |
| प्रकार | प्रकार से | in ways |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 10
- स्रोत अभिलेख
- 3.1
- सहायक विषय
- सुतीक्ष्णजीका प्रेम, अगस्त्य-मिलन, अगस्त्य-संवाद, रामका दण्डक-वन-प्रवेश और जटायु-मिलन
- मुद्रित पृष्ठ
- 631, 633
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।