अरण्यकाण्ड · दोहा 35 · दोहा/सोरठा
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।।35।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.35 · पुस्तक पृ. 666, 667
भावार्थ और शब्दार्थ
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1गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
तीसरी भक्ति है अहंकार रहित होकर गुरु के चरणकमलों की सेवा करना।
English explanation
The third form of devotion is serving the guru’s lotus feet without pride.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गुर | गुरु के | the guru’s |
| पद | चरण | feet |
| पंकज | कमल | lotuses |
| सेवा | सेवा | service |
| तीसरि | तीसरी | third |
| भगति | भक्ति | form of devotion |
| अमान | अहंकार रहित | without pride |
2 चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।।35।।
चौथी भक्ति है कपट छोड़कर मेरे अनेक गुणों का गान करना।
English explanation
The fourth form of devotion is to sing of my manifold virtues, abandoning deceit.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चौथि | चौथी | fourth |
| भगति | भक्ति | form of devotion |
| मम | मेरे | my |
| गुन | गुणों | virtues |
| गन | समूह | multitude |
| करइ | करना | to perform |
| कपट | कपट | deceit |
| तजि | छोड़कर | having abandoned |
| गान | गान | singing |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 35
- स्रोत अभिलेख
- 3.35
- सहायक विषय
- शबरीपर कृपा, नवधा भक्ति-उपदेश और पम्पासरकी ओर प्रस्थान
- मुद्रित पृष्ठ
- 666, 667
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