अरण्यकाण्ड · दोहा 30 · दोहा/सोरठा
कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रधुबीर।।
कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रधुबीर।।
निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर।।30।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.3 · पुस्तक पृ. 660, 662
भावार्थ और शब्दार्थ
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1कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रधुबीर।।
कृपा के सागर रघुवीर राम ने अपने कमल-समान हाथ से जटायु का सिर स्पर्श किया।
English explanation
Rama, hero of the Raghu line and ocean of compassion, touched Jatayu’s head with his lotus-like hand.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कर | हाथ से | with his hand |
| सरोज | कमल-समान | lotus-like |
| सिर | सिर को | the head |
| परसेउ | स्पर्श किया | touched |
| कृपासिंधु | करुणा के सागर | ocean of compassion |
| रधुबीर | रघुकुल के वीर राम | Rama, hero of the Raghu line |
2 निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर।।30।।
सौंदर्य के धाम राम का मुख देखकर जटायु की सारी पीड़ा दूर हो गई।
English explanation
Seeing Rama’s face, the abode of beauty, all of Jatayu’s pain disappeared.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निरखि | देखकर | beholding |
| राम | राम का | Rama’s |
| छबि | सौंदर्य का | of beauty |
| धाम | धाम; निवास | abode |
| मुख | मुख | face |
| बिगत | दूर; समाप्त | gone; dispelled |
| भई | हो गई | became |
| सब | सारी | all |
| पीर | पीड़ा | pain |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 30
- स्रोत अभिलेख
- 3.3
- सहायक विषय
- श्रीरामजीका विलाप, जटायुका प्रसंग
- मुद्रित पृष्ठ
- 660, 662
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