अरण्यकाण्ड · दोहा 32 · दोहा
अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम।
अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम।
तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम॥ ३२॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.32 · पुस्तक पृ. 663, 663
भावार्थ और शब्दार्थ
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1अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम।
अविच्छिन्न भक्ति का वर माँगकर गृध्रराज जटायु भगवान के धाम को गए।
English explanation
Having asked for the boon of unbroken devotion, the vulture Jatayu went to the Lord’s abode.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अबिरल | अविच्छिन्न | unbroken |
| भगति | भक्ति का | of devotion |
| मागि | माँगकर | having asked for |
| बर | वरदान | the boon |
| गीध | गृध्रराज जटायु | Jatayu, the vulture |
| गयउ | गए | went |
| हरिधाम | भगवान के धाम को | to the Lord’s abode |
2 तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम॥ ३२॥
राम ने उनकी अंत्येष्टि यथाविधि अपने हाथों से की।
English explanation
Rama performed his funeral rites duly with his own hands.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तेहि | उन जटायु | that Jatayu |
| की | की | his |
| क्रिया | अंत्येष्टि क्रिया | funeral rites |
| जथोचित | यथाविधि | duly |
| निज | अपने | his own |
| कर | हाथों से | with hands |
| कीन्ही | की | performed |
| राम | भगवान राम ने | Lord Rama |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा 32
- स्रोत अभिलेख
- 3.32
- सहायक विषय
- श्रीरामजीका विलाप, जटायुका प्रसंग
- मुद्रित पृष्ठ
- 663, 663
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