अरण्यकाण्ड · छंद · छंद
विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा।।
मूल पाठ
विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा।।
निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं।।
स्रोत अभिलेख 3.4 · पुस्तक पृ. 623, 624
भावार्थ
मूल पाठ के बादजो एकान्तवासी पुरुष मुक्तिके लिये, इन्द्रियादिका निग्रह करके (उन्हें विषयोंसे हटाकर) प्रसन्नतापूर्वक आपको भजते हैं, वे स्वकीय गतिको (अपने स्वरूपको) प्राप्त होते हैं॥ ८॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 624 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा।।
English explanation
Those dwelling in seclusion always worship you joyfully for liberation.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| विविक्त | एकांत में | in seclusion |
| वासिनः | रहने वाले | those dwelling |
| सदा | सदा | always |
| भजंति | भजन करते हैं | worship |
| मुक्तये | मुक्ति के लिए | for liberation |
| मुदा | आनंदपूर्वक | joyfully |
2 निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं।।
English explanation
Putting aside the hold of the senses and the like, they reach your own ultimate destination.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निरस्य | दूर करके | having put aside |
| इंद्रियादिकं | इंद्रियों आदि को | the senses and the like |
| प्रयांति | प्राप्त होते हैं | reach |
| ते | आपकी | your |
| गतिं | परम गति को | the ultimate destination |
| स्वकं | निज | one's own |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 3.4
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 624
- सहायक विषय
- अत्रि-मिलन एवं स्तुति
- मुद्रित पृष्ठ
- 623, 624
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।