अरण्यकाण्ड · छंद · छंद
तमेकमभ्दुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं।।
मूल पाठ
तमेकमभ्दुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं।।
जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं।।
स्रोत अभिलेख 3.4 · पुस्तक पृ. 623, 624
भावार्थ
मूल पाठ के बादउन (आप) को जो एक (अद्वितीय), अद्भुत (मायिक जगत्से विलक्षण), प्रभु (सर्वसमर्थ), इच्छारहित, ईश्वर (सबके स्वामी), व्यापक, जगद्गुरु, सनातन (नित्य), तुरीय (तीनों गुणोंसे सर्वथा परे) और केवल (अपने स्वरूपमें स्थित) हैं॥ ९॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 624 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 तमेकमभ्दुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं।।
English explanation
I worship that one wondrous Lord, desireless God, all-pervading.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तमेकमभ्दुतं | उस एक अद्भुत को | that one wondrous being |
| प्रभुं | प्रभु को | the Lord |
| निरीहमीश्वरं | इच्छारहित ईश्वर को | the desireless God |
| विभुं | सर्वव्यापक को | the all-pervading one |
2 जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं।।
English explanation
And I worship the world's teacher, eternal, the fourth state beyond waking, dreaming, and deep sleep, the one without a second.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जगद्गुरुं | जगत के गुरु को | the teacher of the world |
| च | और | and |
| शाश्वतं | सनातन को | the eternal one |
| तुरीयमेव | तुरीय ही को | the fourth state itself |
| केवलं | अद्वितीय को | the one without a second |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 3.4
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 624
- सहायक विषय
- अत्रि-मिलन एवं स्तुति
- मुद्रित पृष्ठ
- 623, 624
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।