अरण्यकाण्ड · छंद · छंद
त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सरा।।
मूल पाठ
त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सरा।।
पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले।।
स्रोत अभिलेख 3.4 · पुस्तक पृ. 623, 624
भावार्थ
मूल पाठ के बादजो मनुष्य मत्सर (डाह) रहित होकर आपके चरणकमलोंका सेवन करते हैं, वे तर्क-वितर्क (अनेक प्रकारके सन्देह) रूपी तरङ्गोंसे पूर्ण संसाररूपी समुद्रमें नहीं गिरते (आवागमनके चक्करमें नहीं पड़ते)॥ ७॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 624 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सरा।।
English explanation
Those people who worship at your feet, free from envy—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| त्वदंघ्रि | आपके चरणों के | of your feet |
| मूल | मूल में, शरण में | at their base, in their shelter |
| ये | जो | who |
| नराः | मनुष्य | people |
| भजंति | भजन करते हैं | worship |
| हीन | रहित | free from |
| मत्सरा | ईर्ष्या से | envy |
2 पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले।।
English explanation
They do not fall into the ocean of worldly existence, crowded with waves of contentious reasoning.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पतंति | गिरते हैं | fall |
| नो | नहीं | not |
| भवार्णवे | संसार-सागर में | into the ocean of worldly existence |
| वितर्क | कुतर्कों की | of contentious reasoning |
| वीचि | तरंगों से | with waves |
| संकुले | भरे हुए में | into that crowded ocean |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 3.4
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 624
- सहायक विषय
- अत्रि-मिलन एवं स्तुति
- मुद्रित पृष्ठ
- 623, 624
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।