अरण्यकाण्ड · छंद · छंद
नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दहे भक्तवत्सल! हे कृपालु! हे कोमल स्वभाववाले! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निष्काम पुरुषोंको अपना परमधाम देनेवाले आपके चरणकमलोंको मैं भजता हूँ॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 623 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।।
भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं।।
स्रोत अभिलेख 3.4 · पुस्तक पृ. 623, 624
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।।
English explanation
AI-generated draft: I bow to Rama, loving toward devotees, compassionate, and gentle in nature.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नमामि | मैं प्रणाम करता हूँ | I bow to |
| भक्त | भक्तों के प्रति | toward devotees |
| वत्सलं | स्नेह रखने वाले को | the loving one |
| कृपालु | दयालु | compassionate |
| शील | स्वभाव में | in disposition |
| कोमलं | कोमल को | the gentle one |
2 भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं।।
English explanation
I worship your lotus feet, which grant your own abode to those free of desire.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भजामि | मैं भजन करता हूँ | I worship |
| ते | आपके | your |
| पदांबुजं | चरण-कमल को | lotus feet |
| अकामिनां | निष्काम जनों को | to those without desires |
| स्वधामदं | अपना धाम देने वाले को | that which grants its own abode |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 3.4
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 623
- सहायक विषय
- अत्रि-मिलन एवं स्तुति
- मुद्रित पृष्ठ
- 623, 624
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।