अरण्यकाण्ड · छंद · छंद
जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं।
मूल पाठ
जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं।
करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं॥
सो प्रगट करुना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई।
मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई॥ ३॥
स्रोत अभिलेख 3.32 · पुस्तक पृ. 663, 663
भावार्थ
मूल पाठ के बादजिनको श्रुतियाँ निरञ्जन (मायासे परे), ब्रह्म, व्यापक, निॢवकार और जन्मरहित कहकर गान करती हैं। मुनि जिन्हें ध्यान, ज्ञान, वैराग्य और योग आदि अनेक साधन करके पाते हैं। वे ही करुणाकन्द, शोभाके समूह [स्वयं श्रीभगवान्] प्रकट होकर जड़-चेतन समस्त जगत्को मोहित कर रहे हैं। मेरे हृदय-कमलके भ्रमररूप उनके अंग-अंगमें बहुत-से कामदेवोंकी छवि शोभा पा रही है॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 664 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं।
English explanation
The Vedas sing of him as stainless Brahman, all-pervading, pure, and unborn—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जेहि | जिन्हें | whom |
| श्रुति | वेद | the Vedas |
| निरंजन | मलिनता से रहित | stainless |
| ब्रह्म | परम सत्य ब्रह्म | Brahman, the ultimate reality |
| ब्यापक | सर्वव्यापक | all-pervading |
| बिरज | रज या मल से रहित | free of impurity |
| अज | अजन्मा | unborn |
| कहि | कहकर | calling him |
| गावहीं | गुणगान करते हैं | sing his praise |
2करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं॥
English explanation
Whom many sages attain through meditation, knowledge, detachment, and yoga—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करि | करके | practicing |
| ध्यान | ध्यान | meditation |
| ग्यान | ज्ञान | knowledge |
| बिराग | वैराग्य | detachment |
| जोग | योग | yoga |
| अनेक | अनेक | many |
| मुनि | मुनिजन | sages |
| जेहि | जिन्हें | whom |
| पावहीं | प्राप्त करते हैं | attain |
3सो प्रगट करुना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई।
English explanation
That same one has manifested; the source of compassion and a treasury of beauty, he enchants all that is stationary and moving.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सो | वही | that same one |
| प्रगट | प्रकट हुए | has manifested |
| करुना | करुणा के | of compassion |
| कंद | मूल स्रोत | root source |
| सोभा | शोभा का | of beauty |
| बृंद | पुंज | treasury |
| अग | अचल या जड़ जगत को | the stationary world |
| जग | चल या चेतन जगत को | the moving world |
| मोहई | मोहित करते हैं | enchants |
4मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई॥ ३॥
English explanation
He is the bee of my heart’s lotus; his limbs shine with the beauty of many gods of love.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मम | मेरे | my |
| हृदय | हृदय के | of the heart |
| पंकज | कमल के | of the lotus |
| भृंग | भ्रमर | bee |
| अंग | अंग | limbs |
| अनंग | कामदेव की | of the god of love |
| बहु | अनेकों की | of many |
| छबि | सुंदरता से | with beauty |
| सोहई | शोभित हैं | shine |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 3.32
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 664
- सहायक विषय
- श्रीरामजीका विलाप, जटायुका प्रसंग
- मुद्रित पृष्ठ
- 663, 663
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।