अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए।।
मूल पाठ
सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए।।
मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई।।
स्रोत अभिलेख 3.12 · पुस्तक पृ. 635, 636
भावार्थ
मूल पाठ के बादयह सुनते ही अगस्त्यजी तुरंत ही उठ दौड़े। भगवान्को देखते ही उनके नेत्रोंमें [आनन्द और प्रेमके आँसुओंका] जल भर आया। दोनों भाई मुनिके चरणकमलोंपर गिर पड़े। ऋषिने [उठाकर] बड़े प्रेमसे उन्हें हृदयसे लगा लिया॥ ५॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 636 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए।।
English explanation
Hearing this, Agastya immediately rose and hurried forward; seeing Rama, his eyes filled with tears.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनत | सुनते ही | upon hearing |
| अगस्ति | अगस्त्य ऋषि | sage Agastya |
| तुरत | तुरंत | immediately |
| उठि | उठकर | rising |
| धाए | दौड़े | hurried forward |
| हरि | भगवान राम | the Lord, Rama |
| बिलोकि | देखकर | seeing |
| लोचन | आँखों में | in his eyes |
| जल | आँसू | tears |
| छाए | भर गए | welled up |
2 मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई।।
English explanation
Both brothers fell at the sage's lotus feet; the sage lovingly clasped them to his chest.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मुनि | मुनि के | the sage's |
| पद | चरण | feet |
| कमल | कमल-समान | lotus-like |
| परे | गिरकर प्रणाम किया | fell in reverence |
| द्वौ | दोनों | both |
| भाई | भाई | brothers |
| रिषि | ऋषि अगस्त्य ने | sage Agastya |
| अति | अत्यंत | very great |
| प्रीति | प्रेम से | with love |
| लिए | ले लिया | took them |
| उर | हृदय से | to his chest |
| लाई | लगाकर | clasping |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.12
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 636
- सहायक विषय
- सुतीक्ष्णजीका प्रेम, अगस्त्य-मिलन, अगस्त्य-संवाद, रामका दण्डक-वन-प्रवेश और जटायु-मिलन
- मुद्रित पृष्ठ
- 635, 636
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।