अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैंसें।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दमध्यम श्रेणीकी पतिव्रता पराये पतिको कैसे देखती है, जैसे वह अपना सगा भाई, पिता या पुत्र हो। (अर्थात् समान अवस्थावालेको वह भाईके रूपमें देखती है, बड़ेको पिताके रूपमें और छोटेको पुत्रके रूपमें देखती है।) जो धर्मको विचारकर और अपने कुलकी मर्यादा समझकर बची रहती है, वह निकृष्ट (निम्रश्रेणीकी) स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं॥ ७॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 626 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैंसें।।
धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई।।
स्रोत अभिलेख 3.5 · पुस्तक पृ. 625, 627
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैंसें।।
English explanation
How does the middle-ranking faithful wife regard another man? As her own brother, father, or son.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मध्यम | मध्यम श्रेणी की पतिव्रता | the middle-ranking faithful wife |
| परपति | अन्य स्त्री के पति; दूसरे पुरुष | another woman’s husband; another man |
| देखइ | देखती है | regards |
| कैसें | किस प्रकार | how |
| भ्राता | भाई | brother |
| पिता | पिता | father |
| पुत्र | पुत्र | son |
| निज | अपने | her own |
| जैंसें | के समान | like |
2 धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई।।
English explanation
A woman who remains restrained out of regard for duty and family honor belongs to the lower category, so scripture says.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| धर्म | धर्म को | duty |
| बिचारि | विचारकर | considering |
| समुझि | ध्यान में रखकर | keeping in mind |
| कुल | कुल की मर्यादा | family honor |
| रहई | संयम में रहती है | remains restrained |
| सो | वह | that |
| निकिष्ट | निम्न श्रेणी की | of the lower category |
| त्रिय | स्त्री | woman |
| श्रुति | वेद-वाणी | Vedic scripture |
| अस | ऐसा | thus |
| कहई | कहती है | says |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.5
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 626
- सहायक विषय
- श्रीसीता-अनसूया-मिलन और श्रीसीताजीको अनसूयाजीका पातिव्रतधर्म कहना
- मुद्रित पृष्ठ
- 625, 627
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।