अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
प्रभु जो दीन्ह सो बरु मैं पावा। अब सो देहु मोहि जो भावा।।
मूल पाठ
प्रभु जो दीन्ह सो बरु मैं पावा। अब सो देहु मोहि जो भावा।।
स्रोत अभिलेख 3.11 · पुस्तक पृ. 633, 635
भावार्थ
मूल पाठ के बाद[तब मुनि बोले—] प्रभुने जो वरदान दिया वह तो मैंने पा लिया। अब मुझे जो अच्छा लगता है वह दीजिये—॥ १४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 635 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 प्रभु जो दीन्ह सो बरु मैं पावा। अब सो देहु मोहि जो भावा।।
English explanation
The sage said, “Lord, I have received the boon you gave; now grant what is dear to me.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रभु | हे प्रभु | O Lord |
| जो | जो | which |
| दीन्ह | आपने दिया | you gave |
| सो | वह | that |
| बरु | वरदान | boon |
| मैं | मैंने | I |
| पावा | प्राप्त किया | received |
| अब | अब | now |
| सो | वह | that |
| देहु | दीजिए | grant |
| मोहि | मुझे | to me |
| जो | जो | which |
| भावा | प्रिय लगा | is dear to me |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.11
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 635
- सहायक विषय
- सुतीक्ष्णजीका प्रेम, अगस्त्य-मिलन, अगस्त्य-संवाद, रामका दण्डक-वन-प्रवेश और जटायु-मिलन
- मुद्रित पृष्ठ
- 633, 635
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।