अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउ सो तोही।।
मूल पाठ
परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउ सो तोही।।
मुनि कह मै बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परइ झूठ का साचा।।
स्रोत अभिलेख 3.11 · पुस्तक पृ. 633, 635
भावार्थ
मूल पाठ के बाद[और कहा—] हे मुनि! मुझे परम प्रसन्न जानो। जो वर माँगो, वही मैं तुम्हें दूँ! मुनि सुतीक्ष्णजीने कहा—मैंने तो वर कभी माँगा ही नहीं। मुझे समझ ही नहीं पड़ता कि क्या झूठ है और क्या सत्य है, (क्या माँगूँ, क्या नहीं)॥ १२॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 635 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउ सो तोही।।
English explanation
Rama said, “Sage, know that I am greatly pleased. Whatever boon you ask, I will give you.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| परम | अत्यंत | greatly |
| प्रसन्न | प्रसन्न | pleased |
| जानु | जानिए | know |
| मुनि | हे मुनि | O sage |
| मोही | मुझे | me |
| जो | जो भी | whatever |
| बर | वरदान | boon |
| मागहु | आप माँगें | you ask |
| देउ | मैं दूँगा | I will give |
| सो | वही | that |
| तोही | आपको | to you |
2 मुनि कह मै बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परइ झूठ का साचा।।
English explanation
The sage says, “I have never asked for a boon; I cannot discern what is false and what is true.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मुनि | मुनि | the sage |
| कह | कहते हैं | says |
| मै | मैंने | I |
| बर | वरदान | a boon |
| कबहुँ | कभी | ever |
| न | नहीं | not |
| जाचा | माँगा | asked for |
| समुझि | समझ में | to understanding |
| न | नहीं | not |
| परइ | आता | comes |
| झूठ | क्या झूठ है | what is false |
| का | क्या | what |
| साचा | सच्चा है | is true |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.11
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 635
- सहायक विषय
- सुतीक्ष्णजीका प्रेम, अगस्त्य-मिलन, अगस्त्य-संवाद, रामका दण्डक-वन-प्रवेश और जटायु-मिलन
- मुद्रित पृष्ठ
- 633, 635
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।