अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दरास्तेमें अपनी अनुपम भक्तिका वर्णन करते हुए देवताओंके राजराजेश्वर श्रीरामजी अगस्त्य मुनिके आश्रमपर पहुँचे। सुतीक्ष्ण तुरंत ही गुरु अगस्त्यजीके पास गये और दण्डवत् करके ऐसा कहने लगे—॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 636 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा।।
तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ।।
स्रोत अभिलेख 3.12 · पुस्तक पृ. 635, 636
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा।।
English explanation
Speaking on the way of incomparable devotion to himself, Rama, lord of the gods, reached the sage's hermitage.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पंथ | रास्ते में | on the way |
| कहत | कहते हुए | speaking of |
| निज | अपने प्रति | to himself |
| भगति | भक्ति | devotion |
| अनूपा | अनुपम | incomparable |
| मुनि | अगस्त्य मुनि के | of sage Agastya |
| आश्रम | आश्रम में | to the hermitage |
| पहुँचे | पहुँचे | arrived |
| सुरभूपा | देवों के स्वामी राम | Rama, lord of the gods |
2 तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ।।
English explanation
Sutikshna immediately went to his teacher and, bowing prostrate, began to speak thus.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुरत | तुरंत | immediately |
| सुतीछन | सुतीक्ष्ण ऋषि | sage Sutikshna |
| गुर | गुरु अगस्त्य के | his teacher Agastya's |
| पहिं | पास | presence |
| गयऊ | गए | went |
| करि | करके | having made |
| दंडवत | भूमि पर लेटकर प्रणाम | a prostrate bow |
| कहत | कहने लगे | began speaking |
| अस | इस प्रकार | thus |
| भयऊ | हुए / लगे | began |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.12
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 636
- सहायक विषय
- सुतीक्ष्णजीका प्रेम, अगस्त्य-मिलन, अगस्त्य-संवाद, रामका दण्डक-वन-प्रवेश और जटायु-मिलन
- मुद्रित पृष्ठ
- 635, 636
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।