अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा।।
मूल पाठ
जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा।।
सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना।।
स्रोत अभिलेख 3.28 · पुस्तक पृ. 656, 658
भावार्थ
मूल पाठ के बादजैसे सिंहकी स्त्रीको तुच्छ खरगोश चाहे, वैसे ही अरे राक्षसराज! तू [मेरी चाह करके] कालके वश हुआ है। ये वचन सुनते ही रावणको क्रोध आ गया, परन्तु मनमें उसने सीताजीके चरणोंकी वन्दना करके सुख माना॥ ८॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 658 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा।।
English explanation
‘Like a puny hare desiring a lion’s mate, you have fallen under death’s power, O king of demons!’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जिमि | जैसे | as |
| हरिबधुहि | सिंह की पत्नी को | the lion’s mate |
| छुद्र | तुच्छ | puny; insignificant |
| सस | खरगोश | hare |
| चाहा | चाहे | desired |
| भएसि | तुम हो गए हो | you have become |
| कालबस | काल या मृत्यु के अधीन | subject to death |
| निसिचर | राक्षसों के | of the demons |
| नाहा | हे स्वामी | O lord |
2 सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना।।
English explanation
Hearing these words, Ravana grew angry, yet inwardly he bowed to Sita’s feet and felt joy.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनत | सुनते ही | upon hearing |
| बचन | वचन | the words |
| दससीस | दस सिरों वाला रावण | ten-headed Ravana |
| रिसाना | क्रोधित हुआ | became angry |
| मन | मन | his mind |
| महुँ | में | within |
| चरन | सीता के चरणों को | Sita’s feet |
| बंदि | प्रणाम करके | having bowed to |
| सुख | आनंद | joy |
| माना | अनुभव किया | felt |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.28
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 658
- सहायक विषय
- मारीचप्रसंग और स्वर्ण-मृगरूपमें मारीचका मारा जाना · श्रीसीताहरण और श्रीसीता-विलाप
- मुद्रित पृष्ठ
- 656, 658
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।