अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्द[श्रीरामजीने कहा—] हे मुनि! तुम मेरा स्वभाव जानते ही हो। क्या मैं अपने भक्तोंसे कभी कुछ छिपाव करता हूँ? मुझे ऐसी कौन-सी वस्तु प्रिय लगती है, जिसे हे मुनिश्रेष्ठ! तुम नहीं माँग सकते?॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 674 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ।।
कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी।।
स्रोत अभिलेख 3.42 · पुस्तक पृ. 674, 675
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ।।
English explanation
Sage, you know my nature. Do I ever conceal anything from my devotee?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जानहु | जानते हो | you know |
| मुनि | हे मुनि | O sage |
| तुम्ह | तुम | you |
| मोर | मेरा | my |
| सुभाऊ | स्वभाव | nature |
| जन | भक्त | devotee |
| सन | से | from |
| कबहुँ | कभी | ever |
| कि | क्या | do I? |
| करउँ | मैं करता हूँ | I practice |
| दुराऊ | छिपाव | concealment |
2 कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी।।
English explanation
Excellent sage, what thing is so dear to me that you cannot ask for it?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कवन | कौन-सी | which |
| बस्तु | वस्तु | thing |
| असि | ऐसी | such |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| मोहि | मुझे | to me |
| लागी | लगती है | seems |
| जो | कि जिसे | that it |
| मुनिबर | हे श्रेष्ठ मुनि | O excellent sage |
| न | नहीं | not |
| सकहु | सकते हो | can |
| तुम्ह | तुम | you |
| मागी | माँगना | ask for |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.42
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 674
- सहायक विषय
- नारद-राम-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 674, 675
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।